सभ्य समाज को ही मिलती है अच्छी पुलिस

साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता, जाने माने शायर और इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति रहे आनंद नारायण मुल्ला ने 1961 में भारतीय पुलिस व्यवस्था को लेकर एक आलोचनात्मक आदेश लिखा जिसकी गूंज आज भी सुनाई पड़ती है।

जब भी भारतीय पुलिस कहीं गैर संवैधानिक, गैर कानूनी और असभ्य व्यवहार करती है तो सरकार बनाम मोहम्मद नईम(1961) के मामले में माननीय मुल्ला महोदय की वह टिप्पणी याद आती है जिसमें उन्होंने कहा था, “पूरे देश में ऐसा कोई अराजक समूह नहीं है जिसका अपराध का रिकार्ड उस संगठित बल के नजदीक हो जिसे हम भारतीय पुलिस बल कहते हैं।” इसके बाद उन्होंने कहा, “अगर मुझे लगता है कि मैं अपने अकेले प्रयास से यह गंदगी, यानी पुलिस बल, की सफाई कर सकता तो मैं अपने इस लड़ाई को आगे बढ़ाने से न डरता।”

लेकिन इसी आदेश के बाद उन्होंने टिप्पणी की कि वैसे तो मैं पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध आलोचनात्मक टिप्पणी करता रहता हूं लेकिन पता नहीं क्यों यह टिप्पणी ज्यादा चर्चित हुई। इससे यह भी लगता है कि मेरी टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए कोई सुधार नहीं किया जाता।

आज पैंसठ साल बाद लगता है कि भारतीय पुलिस की स्थिति ज्यादा ही चिंताजनक हो गई है। या यूं कहा जा सकता है कि समाज की स्थिति अधिक संवेदनहीन हो गई है जहां एकाध बयान तो छोड़िए पुलिस के व्यवहार को लेकर सैकड़ों वीडियो डाले जाते हैं और वे वायरल होते हैं लेकिन पुलिस के चरित्र में कोई सुधार आता हुआ नहीं दिखता।

ताजा घटना मेरठ कलेक्ट्रेट की है जहां पर शहर के कप्तान अविनाश पांडेय द्वारा दलित प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज और प्रिजन वैन में एक वकील के साथ मार पिटाई करने की घटना ने गंभीर विवाद पैदा कर रखा है। हालांकि कप्तान महोदय ने हिंसा की कोई जानलेवा कार्रवाई नहीं की लेकिन उनके व्यवहार में पुलिस प्रशासन के दर्प के साथ ‘वर्णव्यवस्था का अहंकार’ जिस प्रकार परिलक्षित होता दिखा उससे समाज बुरी तरह विभाजित हो गया है।

कप्तान महोदय भी अपने पक्ष में वीडियो जारी कर महज भारतीय न्याय संहिता का हवाला दे रहे हैं और अपने अधिकारियों के घायल होने का केस बना रहे हैं और प्रदर्शनकारियों को अपराधी बता रहे हैं। उनके पक्ष में टिप्पणी करने वाले जातिगत नजरिए से टिप्पणी करते हुए उनके व्यवहार को उचित ठहरा रहे हैं। ऐसी टिप्पणी करने वालों का कहना है कि अनुसूचित जाति के लोग इसी लायक हैं।

इसके जवाब में दलित समाज की प्रतिक्रिया में पीड़ा और विद्वेष दोनों है। कहा जा रहा है कि सरकार सवर्ण अधिकारियों की नियुक्ति इसीलिए करती है ताकि अल्पसंख्यकों और दलितों का दमन किया जा सके।

चूंकि भारत विविधतापूर्ण देश है और यहां की अच्छाइयां बहुरंगी होती हैं, उसी तरह यहां की बुराइयां भी बहुरंगी होती हैं। पुलिस के व्यवहार और सामाजिक तनाव को लेकर इन दिनों पंजाब भी गरम है। एक तरफ अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई ने पंजाब के एक पुलिस अधिकारी गुरिंदर जीत सिंह नागरा को फिरौती मांगने के एक अंतरराष्ट्रीय मामले में शामिल बताया है और उनके प्रत्यर्पण कराने का इरादा जताया है तो दूसरी ओर पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की जीवनी पर आधारित ‘सतलज’ फिल्म को ओटीटी प्लेटफार्म से हटा लेने के बाद राज्य में बवाल मचा है।

एक बार फिर से लोग पंजाब के आतंकवाद के औचित्य और उसे मिटाने के लिए की गई पुलिस की ज्यादती पर गंभीर बहस करने लगे हैं। राज्य के अखबार इन चर्चाओं से भरे पड़े हैं। भले ही खालड़ा के अपहरण और हत्या के मामले में सर्वोच्च न्यायालय पुलिस अधिकारियों को दोषी पाकर उन्हें सजा दे चुकी है लेकिन समाज का एक तबका आतंकवाद को खत्म करने के उसी तरीके को सही मानता है और उसकी तुलना आतंकवादी गतिविधियों के करते हुए हत्याओं के आंकड़े गिनाने को तत्पर है।

अकाली दल और खालड़ा मिशन आर्गनाइजेशन ने चर्चित कलाकार दलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलज’ का निजी तौर पर प्रदर्शन किया है। पहले इस फिल्म का नाम ‘घल्लूघारा’ था जिसका अर्थ है नरसंहार। क्योंकि जसवंत खालड़ा ने 2000 युवाओं के एनकाउंटर के तथ्य इकट्ठा किए थे।

ऐसी ही एक घटना बिहार में भरत तिवारी नाम के नौजवान के एनकाउंटर के बाद हुई जब हाफ एनकाउंटर और फुल एनकाउंटर ही नहीं ब्राह्मणों की रक्षा और उसके मुकाबले बहुजन आख्यान की धारा सोशल मीडिया पर बह निकली। ब्राह्मण बिरादरी भरत तिवारी के एनकाउंटर को गैर कानूनी बताते हुए उसे भगत सिंह बता रहा था जबकि भरत तिवारी अपने गांव वालों के हित के लिए निस्वार्थी भाव से लड़ता जरूर था, लेकिन वह सांप्रदायिक सोच से भरा हुआ था।

दूसरी ओर सम्राट चौधरी की बिरादरी और दूसरी दलित पिछड़ी जातियों के लोग इसे कानून व्यवस्था की समस्या बताकर ऐसे ही दंड दिए जाने की वकालत कर रहे थे। 

यह स्थितियां बताती हैं कि जिस समाज में सांप्रदायिक और जातिगत वर्चस्व और विद्वेष भरा हो, अन्याय और भ्रष्टाचार रोजमर्रा की जीवन शैली बन गए हों वहां न तो मानवाधिकारों की रक्षा हो सकती है और न ही व्यक्ति की गरिमा कायम की जा सकती है। वहां बिहार का न्याय कुछ और होगा, यूपी का कुछ और। पंजाब का कुछ और होगा और बंगाल का और।

डॉ राम मनोहर लोहिया अपने प्रसिद्ध व्याख्यान ‘निराशा के कर्तव्य’ में पूरी दुनिया से परमाणु हथियार समेत दूसरे हथियार खत्म करने की योजना पेश करते हैं। इसी के साथ वे पुलिस के व्यवहार और तरीकों में भी बदलाव लाने का सुझाव देते हैं। वे यूरोपीय देशों का हवाला देते हुए कहते हैं कि वहां घरेलू जनता को नियंत्रित करने के लिए पुलिस अनावश्यक और गैर कानूनी बल का प्रयोग नहीं करती। कई देशों की पुलिस तो अपनी जनता को डंडे से ही नियंत्रित करती है।

लेकिन उनका मानना था कि समाज में जब तक अत्याचार और अन्याय होता रहेगा तब तक हथियार खत्म नहीं होंगे। अगर राज्य व्यवस्था अन्याय करने के लिए हथियार का इस्तेमाल करेगी तो उसके विरुद्ध भी हथियार उठेंगे। अच्छा हो कि उसका प्रतिरोध अहिंसक रहे। लेकिन सदैव वैसा संभव नहीं होता। 

अमेरिका में जब डोनाल्ड ट्रंप पहली बार राष्ट्रपति बने थे तो 2020 में जार्ड फ्लायड नाम के एक काले व्यक्ति को काबू करने के लिए पुलिस अधिकारी डेरेक चोविन ने उसकी गर्दन पर नौ मिनट तक अपना पैर रखकर दबाए रखा। सांस रुकने से फ्लायड की मृत्यु हो गई। इस घटना ने अमेरिकी समाज को इतना उद्वेलित कर दिया कि गोरे काले सभी मिलकर सड़कों पर उतर पड़े। उनके आंदोलन के चलते पुलिस अधिकारियों को घुटना टेक कर माफी मांगते देखा गया। बाद में इस आंदोलन के चलते ट्रंप को हटाए जाने का जनमत भी तैयार हुआ। हालांकि ट्रंप फिर वापस आ गए और अब उनके विरोध में ‘नो किंग’ आंदोलन छिड़ा हुआ है।

कहने का तात्पर्य यह नहीं कि पश्चिमी समाज ने अपने भीतरी विभेद, अन्याय और हिंसा की सारी समस्याएं हल कर ली हैं। वह समाज गैर-यूरोपीय समाज के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार जरूर करता है लेकिन अपने भीतर तर्क के आधार पर काम करता है और अतीत की बुराइयों से पीछा छुड़ाने के लिए सक्रिय रहता है। इस कोशिश में उस समाज ने अपनी बहुत सी बुराइयों को मिटाया है और आगे बढ़ा है। वह एक बार लड़ने निकलता है तो आरपार करता है।

भारतीय समाज के साथ दिक्कत यह है कि यहां बुराई से लड़ने और अच्छा समाज बनाने का जज्बा कमजोर है। यहां जाति व्यवस्था से पीड़ित समाज भी उससे पूरी शिद्दत के साथ नहीं लड़ता। बल्कि उसे अन्याय को धैर्य से सहने की शिक्षा दी जाती है। सांप्रदायिकता से पीड़ित समाज भी मुकाबला करने के लिए किसी चीज का बलिदान नहीं करता। लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले सोशल मीडिया पर ही गाल बजाते रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट पुलिस सुधार का आदेश देता है लेकिन नेताओं की बिरादरी उसे घोंटकर पी जाती है।

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह पुलिस व्यवस्था को राजनीतिक आकाओं की गिरफ्त से निकालने के लिए निरंतर सक्रिय रहे सुप्रीम कोर्ट से आदेश भी पारित करवा लाए लेकिन हुआ कुछ नहीं। पुलिस अधिकारी जातिवादी और सांप्रदायिक नेताओं को खुश करने के लिए भारतीय दंड संहिता (अब भारतीय न्याय संहिता) की मनमानी व्याख्या करते हैं और संविधान व उसके मूल्यों को ठेंगे पर रखते हैं।

संविधान की प्रस्तावना में राष्ट्र की एकता और अखंडता की रक्षा के साथ ‘नागरिकों की गरिमा’ को कायम रखने का वादा किया गया है। पुलिस समय समय पर नागरिकों की जानमाल की हिफाजत करती है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन अब वह बहुसंख्यकवादी हो चली है।

उसकी प्राथमिकता नागरिकों की हिफाजत से अधिक सत्ता में बैठे नेताओं और अफसरों की हिफाजत करने की हो गई है। लेकिन यह स्थिति बदलने के लिए हमें पहले एक बेहतर और सभ्य समाज बनाना होगा, क्योंकि सभ्य समाज को ही सभ्य पुलिस मिलती है।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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